Saturday, 29 March 2014

सम्पूर्ण प्रकाश

तुम हो सम्पूर्ण प्रकाश ,

मैं केवल एक किरण मात्र हूँ

तुमसे हूँ हर पल जुड़ी,

तुमसे ही उन्मुक्त हूँ।

तुमसे ही सिन्दूरी गगन पर छिट्की ,

निशा की ओट में तुम में ही सुप्त हूँ 

तुमसे ही हूँ प्रकट ,

तुम में ही गुप्त हूँ 

हर दिशा ,हर कॅण पर बिखरी तुमसे ही,

तुम में ही लुप्त हूँ।

तुम मुझ में हो , या मैं तुम में हूँ बसी,


जैसा चाहे तुम कहो,


मैं हर कथन में तृप्त हूँ।

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