Friday, 28 March 2014

श्वेत पवन हंस

ओ मेरे श्वेत पवन हंस ,

तेरे ही परों पर अब मुझको ,


कितनी उड़ाने भरनी हैं !


मेरी उंगली थाम कभी,


नन्हे पैरों से चलता था डगमग कदम कई, 


अब बलिष्ठ भुजाएं थाम तेरी,


मुझे अनंत दूरी तय करनी है!


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको,


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !


धरती थी सूखी, प्यास थी बड़ी,


वक़्त था कड़ा, पर आस थी खड़ी,


अम्बर के समुंदर से अब सीधे ,


मुझे अपनी जल गागर भरनी है !


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको ,


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !


ढलती सांझ के साए थे, 


कुछ अपने, कुछ पराये थे 


पुरानी सोच ने कुछ विश्वास हिलाए थे,


अब तेरी नयी सोच के नूर में,


हर सुबह की चमकीली किरनें चुननी हैं !


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको, 


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !

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