Saturday, 29 March 2014

तरंग.....


भोर की जादुई तरंगों के संग ,

चल कर मुझ तक आता है कोई,.

सोता देख कर मुझ को , 

मेरी पेशानी की ,

सलवटों को सहलाता है कोई,.

खड़ी करता हूँ हर रात,

कितनी ही दीवारें,

हर सुबह आ-आ कर,

मेरे सपनों में सेंध लगाता है कोई..

सुबह की ओस बन कर,

तो कभी ठन्डे पानी की फुहार बन कर,

दिल की सूखी जमीन पर ,

बिखर जाता है कोई.

इक खुशबू सी उड़तीहै,

इक कली कोई चटकती है,

इक रंग बिखरता है कोई,

भोर की किरणों को भर आँखों में,

पलकें खोल कर देखता हूँ तो,

नज़र आता नहीं कोई !

1 comment:

  1. Expressing emotions through nature's beauty! Truly amazing! :-)

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