Saturday, 29 March 2014

बादल


तेरी हकीकत की बारिशों से,

बेहतर हैं मेरे सपनों के बादल ,

उड़ान भरतें हैं ऊंचे आसमानों की ;

बरस के ज़मीन पर बिखर जाते नहीं। 

ख़ामोशी


शब्दों  के बीज बो कर हमने ,

ख़ामोशी के फूल खिलाएं हैं ,


राज़ हैं कुछ गहरे इसमें ,


जो चल के खुश्बू के संग ,


बड़ी खामोशी से,


 तुम तक आये हैं। 


आइना


देखती  रही  उम्र भर ,

जो आइना दिखाता रहा ,

भूली  रही  ,है दूसरा भी रुख उसका,

दिखता नहीं जिसमे कुछ भी ,

राज़ मेरे , मुझसे भी छुपाता रहा। 




उड़ान..


मैंने लहरों को ही अपना किनारा बनाया है,

गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है.

ज़िन्दगी में खायी हैं ठोकरें इतनी,

की अब तो कमज़ोरियो को ही अपनी ताक़त बनाया है.

अंधेरों में जब आसमान का न दिखता था कोई ओर- छोर,

ऐसे में भरी हैं उड़ाने इतनी,

की अब तो अपनी उड़ान को ही अपना क्षितिज बनाया है.

मैंने गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है.

रिश्तों की आड़ में छुपे , मिले हैं दुश्मन और दोस्त,

खाए हैं पीठ पर वार और जख्म इतने,

की अब तो आंसुओं से ही, अपने पानिओं को मीठा बनाया है;

मैंने गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है !

तरंग.....


भोर की जादुई तरंगों के संग ,

चल कर मुझ तक आता है कोई,.

सोता देख कर मुझ को , 

मेरी पेशानी की ,

सलवटों को सहलाता है कोई,.

खड़ी करता हूँ हर रात,

कितनी ही दीवारें,

हर सुबह आ-आ कर,

मेरे सपनों में सेंध लगाता है कोई..

सुबह की ओस बन कर,

तो कभी ठन्डे पानी की फुहार बन कर,

दिल की सूखी जमीन पर ,

बिखर जाता है कोई.

इक खुशबू सी उड़तीहै,

इक कली कोई चटकती है,

इक रंग बिखरता है कोई,

भोर की किरणों को भर आँखों में,

पलकें खोल कर देखता हूँ तो,

नज़र आता नहीं कोई !

गुदगुदी

बेकार की बातों से बोझिल मन को,

आ मुक्त कर दें अभी;


ब्रेन के ब्लैक बोर्ड से,


फ़िज़ूल की जानकारियों के फोर्मुले,


आ मिटा दें सभी ;


फिर इसे खाली आकाश सा बना ,


कोई चिड़िया उड़ा दें कभी ,


बादल के एक टुकड़े में ,


बूढी नानी का चेहरा ढूँढें कभी ;


और रात को चाँद से भी ;


मामा का रिश्ता बना लें कभी .


तुम्हारे भीतर का एक छोटा सा बच्चा,


व्यस्तता का मुंह ताक-ताक कर ,


जो ऊँघने लगता है कभी - कभी ,


थोडा सा जतन कर के ,उठा दो उसे,


गुदगुदी कर के हंसा दो उसे कभी ,


तो चादर तान कर और खराटे मार कर


सोएगी नहीं ये ज़िन्दगी !!


सम्पूर्ण प्रकाश

तुम हो सम्पूर्ण प्रकाश ,

मैं केवल एक किरण मात्र हूँ

तुमसे हूँ हर पल जुड़ी,

तुमसे ही उन्मुक्त हूँ।

तुमसे ही सिन्दूरी गगन पर छिट्की ,

निशा की ओट में तुम में ही सुप्त हूँ 

तुमसे ही हूँ प्रकट ,

तुम में ही गुप्त हूँ 

हर दिशा ,हर कॅण पर बिखरी तुमसे ही,

तुम में ही लुप्त हूँ।

तुम मुझ में हो , या मैं तुम में हूँ बसी,


जैसा चाहे तुम कहो,


मैं हर कथन में तृप्त हूँ।

निर्भया


नव वर्ष की इस भोर में , 

चारों ओर से से उठते ,

कोलाहल और शोर में ,

कुछ आशा ,कुछ संशय में ,

कभी साहस ,कभी भय से

विनीत विनम्र भाव से ,

तुम्हारे लिए विनती करती हूँ 

ईश्वर नवजीवन का वरदान दे ,

बन्धनों को तोड़,

उन्मुक्त रहो,

भयमुक्त रहो ,

अंधेरों से लड़ते हुए ,

आशाओं से संयुक्त रहो।

कठिनायियो से लड़ते हुए ,

तुम सदा सबला बनो ,

निर्झर नीर सी निर्मला बनो ,

और सदा निर्भया रहो।

Friday, 28 March 2014

श्वेत पवन हंस

ओ मेरे श्वेत पवन हंस ,

तेरे ही परों पर अब मुझको ,


कितनी उड़ाने भरनी हैं !


मेरी उंगली थाम कभी,


नन्हे पैरों से चलता था डगमग कदम कई, 


अब बलिष्ठ भुजाएं थाम तेरी,


मुझे अनंत दूरी तय करनी है!


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको,


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !


धरती थी सूखी, प्यास थी बड़ी,


वक़्त था कड़ा, पर आस थी खड़ी,


अम्बर के समुंदर से अब सीधे ,


मुझे अपनी जल गागर भरनी है !


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको ,


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !


ढलती सांझ के साए थे, 


कुछ अपने, कुछ पराये थे 


पुरानी सोच ने कुछ विश्वास हिलाए थे,


अब तेरी नयी सोच के नूर में,


हर सुबह की चमकीली किरनें चुननी हैं !


ओ मेरे श्वेत पवन हंस,


तेरे ही परों पर अब मुझको, 


कितनी ही उड़ाने भरनी हैं !