Sunday, 6 April 2014

खुली आँखों का स्वप्न


तुम खुली आँखों का स्वप्न हो,

मासूम हाथों से बना ,

जैसे रेत का एक घर हो। 

मेरी मुट्ठी में बंद ,

जैसे तुम सुबह कि धूप हो,

लगते तुम मुझे ,

मेरा ही एक रूप हो। 




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