KALPTARU .....
Sunday, 6 April 2014
इबारत
तेरी इबारत की लकीरें ही कुछ ऐसी थीं,
की मेरे लिए इबादत बन गईं,
पर खफा जमाना बुलाता है मुझे,
अब लकीर का फकीर !!
जूनून
ता उम्र सहे हैं जुल्म इतने,
कि तेरा हर सितम ,
अब सुकून लगता है ;
भटके बदहवास मुसाफिर को ,
जो बक्श दे फकीरी ,
ये वो जूनून लगता है।
खुली आँखों का स्वप्न
तुम खुली आँखों का स्वप्न हो,
मासूम हाथों से बना ,
जैसे रेत का एक घर हो।
मेरी मुट्ठी में बंद ,
जैसे तुम सुबह कि धूप हो,
लगते तुम मुझे ,
मेरा ही एक रूप हो।
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