Sunday, 6 April 2014

इबारत


तेरी इबारत की लकीरें ही कुछ ऐसी थीं,

की मेरे लिए इबादत बन गईं,

पर खफा जमाना बुलाता है मुझे,

अब लकीर का फकीर !!



जूनून


ता उम्र सहे हैं जुल्म इतने,

कि तेरा हर सितम ,

अब सुकून लगता है ;

भटके बदहवास मुसाफिर को , 

जो बक्श दे फकीरी ,

ये वो जूनून लगता है।

खुली आँखों का स्वप्न


तुम खुली आँखों का स्वप्न हो,

मासूम हाथों से बना ,

जैसे रेत का एक घर हो। 

मेरी मुट्ठी में बंद ,

जैसे तुम सुबह कि धूप हो,

लगते तुम मुझे ,

मेरा ही एक रूप हो। 




Saturday, 29 March 2014

बादल


तेरी हकीकत की बारिशों से,

बेहतर हैं मेरे सपनों के बादल ,

उड़ान भरतें हैं ऊंचे आसमानों की ;

बरस के ज़मीन पर बिखर जाते नहीं। 

ख़ामोशी


शब्दों  के बीज बो कर हमने ,

ख़ामोशी के फूल खिलाएं हैं ,


राज़ हैं कुछ गहरे इसमें ,


जो चल के खुश्बू के संग ,


बड़ी खामोशी से,


 तुम तक आये हैं। 


आइना


देखती  रही  उम्र भर ,

जो आइना दिखाता रहा ,

भूली  रही  ,है दूसरा भी रुख उसका,

दिखता नहीं जिसमे कुछ भी ,

राज़ मेरे , मुझसे भी छुपाता रहा। 




उड़ान..


मैंने लहरों को ही अपना किनारा बनाया है,

गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है.

ज़िन्दगी में खायी हैं ठोकरें इतनी,

की अब तो कमज़ोरियो को ही अपनी ताक़त बनाया है.

अंधेरों में जब आसमान का न दिखता था कोई ओर- छोर,

ऐसे में भरी हैं उड़ाने इतनी,

की अब तो अपनी उड़ान को ही अपना क्षितिज बनाया है.

मैंने गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है.

रिश्तों की आड़ में छुपे , मिले हैं दुश्मन और दोस्त,

खाए हैं पीठ पर वार और जख्म इतने,

की अब तो आंसुओं से ही, अपने पानिओं को मीठा बनाया है;

मैंने गारे और पत्थरों से अपना घर सजाया है !